कोरोना के चलते 14 अप्रैल तक का लॉक डाउन अगर आंशिक तौर पर खत्म भी हो जाता है तो भी उसके बाद इसका असर एक साल तक उद्योग पर दिख सकता है। खासकर देश के छोटे एवं मध्यम उद्योगों को इसका ज्यादा असर दिखेगा।

भारत में करीबन 6.5 करोड़ सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग यानी एमएसएमई हैं। 200 कर्मचारियों वाली कंपनी क्रिएटिव पेरिफेरल्स के केतन पटेल कहते हैं कि अगर 15 अप्रैल से भी लॉक डाउन खुलता है तो यह एक साल तक हम पर असर डालेगा। हालांकि उनका मानना है कि यह लॉक डाउन लंबा चलेगा। मूलरूप से वे अमेजॉन, रिलायंस जैसी कंपनियों को वितरण का काम करते हैं। उनका कहना है कि हम आईटी के क्षेत्र में हैं और अगर सब कुछ सही रहा तो हम तीन महीने तक इन समस्याओं के असर से उबरने की कोशिश करेंगे।

देश के एसएमई स्टॉक एक्सचेंजों पर 100 से ज्यादा कंपनियों को आईपीओ के जरिए लिस्ट करानेवाले पैंटोमैथ कैपिटल एडवाइजर्स के एमडी महावीर लुनावत कहते हैं कि कास्ट जनरेटिंग यूनिट को अब रिवेन्यू जनरेटिंग यूनिट के रूप में बदलना होगा। इसमें ट्रेनिंग के साथ टीम के स्ट्रक्चर में बदलाव करना होगा। साथ ही इन्नोवेशन और टेक्नोलॉजी को भी अब सभी को अपनाना होगा। उनके मुताबिक कोविड-19 का असर बहुत ज्यादा अर्थव्यवस्था पर दिखेगा। हमें इसके लिए लंबी अवधि के लिए रणनीतियों पर काम करना होगा।

500 कर्मचारियों वाली कंपनी मैकपावर सीएनसी मशीन के रूपेश मेहता कहते हैं कि हम रेलवे और रक्षा के क्षेत्र में काम करते हैं तो थोड़ा बहुत काम अभी भी चालू है। पर तनाव तो है ही। खासकर लॉजिस्टिक, रॉ मटेरिलय आदि में लंबे समय तक इसका असर दिख सकता है। लेकिन हालात ठीक नहीं हैं। 250 कर्मचारी वाले मनोरामा ग्रुप के सीईओ आशिष सराफ कहते हैं कि हमारा चूंकि फूड की कंपनी है, इसलिए थोड़ा बहुत काम चालू है। पर आपूर्ति और अन्य सेक्शन बुरी तरह प्रभावित हैं। ऐसे में जितना काम होना चाहिए वह नहीं हो रहा है।

फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन्स (फियो) के महानिदेशक अजय सहाय ने कहा, देरी से भुगतान के अलावा, भारतीय निर्यात भी महामारी से प्रभावित हुआ है, और कंपनियों को आर्डर में 50 प्रतिशत से अधिक रद्द होने का सामना करना पड़ा है।

उन्होंने कहा, सबसे ज्यादा प्रभावित लाइफस्टाइल उत्पादों में कालीन, हस्तशिल्प और परिधान आदि हैं । छोटे व्यवसायों के लिए भारत की अर्थव्यवस्था 2.9 ट्रिलियन डॉलर का लगभग एक चौथाई हिस्सा है और सरकारी अनुमानों के अनुसार यह 500 मिलियन से अधिक श्रमिकों को रोजगार देता है।

ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अमरजीत कौर ने अनुमान जताया है कि 50 लाख से अधिक मजदूरों को उनकी मजदूरी का आंशिक या पूर्ण नुकसान हुआ है। मुंबई स्थित प्राइवेट थिंक टैंक “सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी” के अनुमानों के मुताबिक, भारत की बेरोजगारी दर फरवरी के शुरू में 7.2% से बढ़कर इस हफ्ते 10.4 % हो गई । यहां तक कि जो कामगार इस सप्ताह कुछ सरकारी राहत पा सकते थे, उन्हें बैंकों में देरी का सामना करना पड़ा।

छोटे व्यवसायों के अलावा जो सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं उसमें दूध की आपूर्ति, ग्रोसरी स्टोर, सब्जियों की बिक्री, सिगरेट और बीड़ी के कारखानों और फलों के कारोबार में शामिल लोग हैं। यह सभी व्यक्तिगत तौर पर काम करते हैं और 5-10 कर्मचारियों के साथ काम करते हैं। इनके अलावा उबर, ओला जैसी टैक्सियों, रिक्शा, और निजी टैक्सियों जैसे कारोबार पूरी तरह प्रभावित हुए हैं और इस व्यवसाय में शामिल लाखों लोगों को फिलहाल घर पर बैठने के अलावा कोई चारा नहीं है।

देश में माइग्रेंट कामगारों की बात की जाए तो इसमें 41 प्रतिशत वाहन चालक हैं, 32 प्रतिशत डिलीवरी के क्षेत्र में हैं, 9 प्रतिशत सुरक्षा के क्षेत्र में हैं, 9 प्रतिशत हाउसकीपिंग स्टॉफ हैं और 9 प्रतिशत अन्य हैं। इसमें से 92 प्रतिशत पुरुष और 9 प्रतिशत महिला कामगार हैं। आंकड़े बताते हैं कि इसमें से 15 प्रतिशत की मासिक आय 10 हजार से 15 हजार रुपये, 35 प्रतिशत की 15 से 20 हजार, 20 प्रतिशत की 20 से 25 हजार 10 प्रतिशत की 25 से 30 हजार और 14 प्रतिशत की 30 हजार से ज्यादा मासिक आय है। इसमें सबसे ज्यादा 21 से 25 साल के कामगार हैं जिनकी संख्या 35 प्रतिशत है। जबकि 30 प्रतिशत की उम्र 26-30 साल है।

मुंबई में करीबन एक करोड़ माइग्रेंट कामगार हैं जबकि दिल्ली में 63 प्रतिशत लोग हैं। दिल्ली में अकेले उत्तर प्रदेश से ही 28 लाख लोग नौकरी के लिए जाते हैं। हालांकि यहां गाजियाबाद, नोएडा जैसे इलाके भी दिल्ली में माने जाते हैं, जबकि यह उत्तर प्रदेश में आते हैं। आंकड़े बताते हैं कि कुल माइग्रेंट में से अकेले उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान का हिस्सा 46 फीसदी है।